प्यास बुझाने के लिये कोहरे का सहारा

कोहरे को सिर्फ धुन्ध का गुबार समझना गलत है क्योंकि इस धुन्ध में पानी का विपुल भंडार होता है, जिसे एकत्रित करके पेयजल के रूप में उपयोग कर सकते हैं। दुनियाभर में वैज्ञानिक कोहरे या ओस जैसे अप्रत्याशित स्रोतों से पीने का पानी प्राप्त करने की तकनीक विकसित करने में जुटे हुए हैं, ताकि पानी की किल्लत वाले इलाकों में लोगों को पेयजल उपलब्ध कराया जा सके।

भारतीय वैज्ञानिकों ने अब एक ऐसा मैटेरियल विकसित किया है, जिसकी मदद से घने कोहरे में मौजूद नमी को पानी में परिवर्तित किया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश के मंडी स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित किया गया यह एक पॉलिमर मैटेरियल है।

कई जानवर और पौधे दिलचस्प तरीके से हवा से पानी एकत्रित करते हैं। अफ्रीका के नामीब रेगिस्तान में पाया जाने वाला डार्कलिंग बीटल (झींगुर) हवा में मौजूद पानी के कणों को ग्रहण करने के लिये अपने शरीर की सतह का उपयोग करता है। बीटल कीट अपने पिछले हिस्से को हवा में उठा लेता है और उसके पंखों पर मौजूद सूक्ष्म प्रवाह क्षेत्र तथा उभार हवा की नमी को पानी की बूँदों में बदल देते हैं। इस तरह बीटल के शरीर पर टेफ्लॉन जैसी जल प्रतिरोधी कोटिंग की वजह से पानी सीधे उसके मुँह की ओर पहुँच जाता है।

कोहरे को दुहकर उसमें से पानी निकालने को वैज्ञानिक मिल्किंग फॉग कहते हैं। कोहरे अथवा ओस की बूँदों को पानी में बदलने के लिये खास तरह के कंडेन्सेशन पैनल का उपयोग किया है। इन पैनलों का निर्माण पौधों एवं घास की पत्तियों से प्रेरित है, जिस पर ओस की बूँदे जमा होकर पानी में परिवर्तित हो जाती हैं।

नीति आयोग के मुताबिक भारत में 70 प्रतिशत दूषित जल आपूर्ति होती है और हर साल देश में करीब दो लाख लोगों की मौत साफ पानी नहीं मिल पाने से होती है। अगर वक्त रहते सही कदम नहीं उठाए गए तो वर्ष 2030 तक पेयजल की माँग आपूर्ति के मुकाबले कई गुना बढ़ सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ती आबादी को पेयजल मुहैया कराने के लिये नीतियों और व्यवहार में बदलाव के साथ-साथ प्रकृति प्रेरित वैज्ञानिक एवं तकनीकी नवाचारों को भी शामिल करना उपयोगी हो सकता है।

Source: इंडिया साइंस वायर, 11 अक्टूबर, 2018

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